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उत्तराखंड से पलायन रोकने के दावे हर साल क्यों खोखले साबित हो रहे हैं?

  • Admin
  • Feb 6
  • 2 min read
Photo source- AI generated
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हर चुनाव से पहले एक वादा ज़रूर दोहराया जाता है- “अब उत्तराखंड से पलायन रुकेगा।” नई योजनाएं आती हैं, आयोग बनते हैं, रिपोर्टें जारी होती हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि हर साल गांव और खाली होते जा रहे हैं।


सवाल यह नहीं है कि पलायन हो रहा है या नहीं। सवाल यह है कि इसे रोकने के दावे हर बार असफल क्यों हो जाते हैं? सरकारों का कहना है कि रोजगार बढ़ रहा है और स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है। कागजों में सब कुछ ठीक दिखता है। लेकिन अगर आप किसी पहाड़ी गांव में जाएं, तो बंद घर, खाली स्कूल और केवल बुजुर्ग नज़र आते हैं। युवा वहां नहीं हैं।


पलायन को अक्सर सिर्फ नौकरी की कमी से जोड़ा जाता है, जबकि असली समस्या कहीं गहरी है।

कुछ नौकरियां हैं, लेकिन वे अस्थायी हैं और भविष्य की सुरक्षा नहीं देतीं। स्वरोजगार योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी और मार्गदर्शन गांव तक नहीं पहुंचता। शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका नहीं दे पाती, जिससे बाहर जाना मजबूरी बन जाता है।


हम कहते हैं-“पढ़-लिखकर वापस आओ”, लेकिन लौटने पर न अवसर मिलता है, न सिस्टम का सहयोग।

ऐसे में युवा टिके भी तो कैसे?


पलायन सिर्फ लोगों का नहीं, भरोसे का भी होता है। जब भरोसा टूटता है, तो गांव धीरे-धीरे खाली हो जाते हैं।

अगर योजनाएं और आयोग मौजूद हैं, तो फिर हर साल यह सच्चाई क्यों दोहराई जा रही है?

शायद समस्या योजनाओं की नहीं, उन्हें समझने और लागू करने के तरीके की है।


आपके गांव की क्या कहानी है?

अपना अनुभव साझा कीजिए—क्योंकि उत्तराखंड की असली तस्वीर

कागजों में नहीं, लोगों की ज़िंदगी में दिखती है।


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