चारधाम मंदिर प्रवेश (Temple Ban) विवाद: क्या है मुद्दा? जानिए दोनों पक्षों की राय
- Priyanka Sharma
- 6 days ago
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उत्तराखंड के धार्मिक नेताओं और मंदिर प्रबंधकों ने राज्य सरकार से चारधाम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है।यह मांग बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को लेकर उठाई गई है। कुछ सप्ताह पहले हरिद्वार की ‘गंगा सभा’ ने भी ऐसी ही मांग की थी। गंगा सभा, गंगा घाटों के धार्मिक प्रबंधन से जुड़ा एक ट्रस्ट है। उसने 2027 के कुंभ मेले के दौरान गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी।
चारधाम मंदिर प्रवेश पर रोक के पक्ष में तर्क (Pros)
मंदिर आस्था और पूजा के स्थान हैं, पर्यटन स्थल नहीं।
धार्मिक मर्यादा और परंपराएँ सुरक्षित रहती हैं।
अनुशासनहीनता, reel-Vlog जैसी गतिविधियों पर रोक लग सकती है।
संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम बनाने का अधिकार देता है।
पुरी का जगन्नाथ मंदिर पहले से ही केवल हिंदुओं को प्रवेश देता है, जो एक पुरानी परंपरा है।
चारधाम मंदिर प्रवेश पर रोक के विरोध में तर्क (Cons)
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और धार्मिक सहिष्णुता की भावना को चोट।
जब मंदिर सरकार के अधीन हों, तो धर्म के आधार पर रोक अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) से टकराती है।
तीर्थ पर्यटन से जुड़े स्थानीय रोज़गार पर असर पड़ सकता है।
गैर-हिंदुओं में हिंदू धर्म को लेकर बढ़ती जिज्ञासा और सम्मान को नुकसान।
इससे धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ने की आशंका।
भारत जैसे देश में, जहाँ आस्था और धर्म की सीमाएँ हमेशा स्पष्ट रूप से रेखांकित नहीं रही हैं, वहाँ इस प्रकार का कदम व्यवहारिक दृष्टि से जटिल और विवादास्पद हो सकता है। पीर निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ हिंदुओं सहित विभिन्न धर्मों के लोग सदियों से श्रद्धा के साथ मत्था टेकते आए हैं।
जगन्नाथ पुरी मंदिर का संदर्भ
ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर में
केवल हिंदुओं को गर्भगृह में प्रवेश
गैर-हिंदू बाहर बने दर्शन मंच से दर्शन करते हैं
समर्थक इसे परंपरा मानते हैं
आलोचक इसे आधुनिक संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर देखते हैं
निष्कर्ष
मंदिर प्रवेश विवाद केवल कौन अंदर जाएगा का सवाल नहीं है। यह आस्था, संविधान, सामाजिक सौहार्द और भारत की सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन खोजने की बहस है।









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