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  • नौकरी तय थी… फिर एक निजी सवाल ने सब बदल दिया

    स्त्री संवाद | एक व्यक्तिगत अनुभव मुझे आज भी वह दिन याद है, जब मैं देश के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में, असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए इंटरव्यू देने गई थी। कई दिनों की तैयारी के बाद मैं वहाँ पहुँची थी। अपनी पढ़ाई, और शिक्षण अनुभव को लेकर मैं आश्वस्त थी। इंटरव्यू की शुरुआत भी अच्छी हुई। मुझसे मेरे शोध विषय, पढ़ाने के तरीकों और अकादमिक(Academic) रुचियों के बारे में सवाल पूछे गए। मुझे लगा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में जा रही है। कुछ देर बाद चर्चा अचानक मेरे निजी जीवन की ओर मुड़ गई। मुझसे पूछा गया कि क्या मैं शादीशुदा हूँ। मैंने सहजता से कहा, हाँ। फिर अगला सवाल आया—“क्या आप जल्द ही परिवार बढ़ाने की योजना बना रही हैं?” उस समय मैं गर्भवती थी। कुछ पल के लिए मैं ठिठकी, लेकिन अंततः मैंने सच बताने का फैसला किया। इसके बाद कमरे का माहौल जैसे बदल गया। इंटरव्यू लेने वालों के चेहरों पर हल्की झिझक और असहजता दिखने लगी। बातचीत औपचारिक हो गई। कुछ और प्रश्न पूछे गए, लेकिन अब उनमें वह उत्साह नहीं था जो शुरुआत में था। उसी क्षण मुझे लगा कि शायद फ़ैसला अब योग्यता से अधिक किसी और बात पर टिक गया है। इंटरव्यू खत्म होने के बाद मुझे विनम्रता से बताया गया कि फिलहाल वे ऐसे उम्मीदवार की तलाश में हैं जो “लंबे समय तक बिना किसी 'break' के उपलब्ध रह सके। शब्द बहुत नरम थे, लेकिन अर्थ स्पष्ट था। मुझे इसलिए नहीं चुना गया क्योंकि मैं माँ बनने वाली थी। उस दिन घर लौटते समय मेरे मन में कई सवाल थे। क्या एक महिला की पेशेवर पहचान इतनी आसानी से उसकी मातृत्व से ढक जाती है? क्या एक महिला की पढ़ाई और मेहनत का मूल्य सिर्फ तब तक है, जब तक वह मां न बने? मातृत्व, जीवन का एक स्वाभाविक और सुंदर हिस्सा है, लेकिन अकादमिक और पेशेवर दुनिया में इसे अक्सर एक बाधा की तरह देखा जाता है। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि कई महिलाओं के लिए करियर और मातृत्व के बीच संतुलन बनाना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक चुनौती भी है।

  • अगर चारधाम यात्रा ‘हिंदू-only’ हो गई, तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिर्फ़ श्लोक बनकर रह जाएगा

    Source- AI generated चारधाम यात्रा पर गैर-हिंदुओं की एंट्री को लेकर उठ रहा विवाद अब केवल एक प्रशासनिक या धार्मिक फैसला नहीं रह गया है। यह बहस सीधे-सीधे भारत की सांस्कृतिक आत्मा और हिंदू धर्म की वैश्विक छवि पर सवाल खड़े करती है। पिछले लेख में हम इसके संभावित फायदे और नुकसान पर चर्चा कर चुके हैं। लेकिन इस बहस का एक और पहलू है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता - धर्म की वैश्विक स्वीकार्यता का मुद्दा। बीते कुछ दशकों में हिंदू दर्शन ने दुनिया को आकर्षित किया है। योग, वेदांत, गीता और उपनिषदों का संदेश आज वैश्विक चेतना का हिस्सा बन चुका है। स्टीव जॉब्स का नीम करौली बाबा के कैंची धाम तक पहुँचना, पश्चिमी देशों में ‘हरे कृष्ण-हरे राम’ का गूंजना, या हॉलीवुड की चर्चित हस्तियों का हिंदू धर्म अपनाना - ये सब उसी सॉफ्ट पावर के उदाहरण हैं। पिछले वर्ष वॉशिंगटन में दिवाली पर सार्वजनिक अवकाश घोषित होना भी इसी सांस्कृतिक प्रभाव का संकेत है। ये घटनाएँ न सिर्फ़ हिंदू संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित कर रही हैं, बल्कि गैर-हिंदुओं में जिज्ञासा और सम्मान भी पैदा कर रही हैं। यह फैसला उस बढ़ते आकर्षण को ठेस पहुँचाएगा, जिस पर हिंदू धर्म की वैश्विक स्वीकार्यता टिकी है। साथ ही, भारत की धार्मिक सहिष्णुता की छवि को भी नुकसान पहुँचेगा। आशंका यह भी है कि इसकी नकल करते हुए अन्य धर्म अपने-अपने तीर्थस्थलों को सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। धर्म की रक्षा दरवाज़े बंद करके नहीं, अपने मूल्यों को आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखकर होती है। Reference- अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ अर्थ : यह मेरा है और वह पराया है - ऐसा विचार छोटे मन वालों का होता है। उदार हृदय वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार होती है।

  • चारधाम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक की मांग: क्या है पूरा विवाद?

    उत्तराखंड के धार्मिक नेताओं और मंदिर प्रबंधकों ने राज्य सरकार से चारधाम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है। यह मांग बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री को लेकर उठाई गई है। कुछ सप्ताह पहले हरिद्वार की ‘गंगा सभा’ ने भी ऐसी ही मांग की थी। गंगा सभा, गंगा घाटों के धार्मिक प्रबंधन से जुड़ा एक ट्रस्ट है। उसने 2027 के कुंभ मेले के दौरान गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी। चारधाम मंदिर प्रवेश पर रोक के पक्ष में तर्क मंदिर आस्था और पूजा के स्थान हैं, पर्यटन स्थल नहीं। धार्मिक मर्यादा और परंपराएँ सुरक्षित रहती हैं। अनुशासनहीनता, reel-Vlog जैसी गतिविधियों पर रोक लग सकती है। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम बनाने का अधिकार देता है। पुरी का जगन्नाथ मंदिर पहले से ही केवल हिंदुओं को प्रवेश देता है, जो एक पुरानी परंपरा है। चारधाम मंदिर प्रवेश पर रोक के विरोध में तर्क ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और धार्मिक सहिष्णुता की भावना को चोट। जब मंदिर सरकार के अधीन हों, तो धर्म के आधार पर रोक अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) से टकराती है। तीर्थ पर्यटन से जुड़े स्थानीय रोज़गार पर असर पड़ सकता है। गैर-हिंदुओं में हिंदू धर्म को लेकर बढ़ती जिज्ञासा और सम्मान को नुकसान। इससे धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ने की आशंका। भारत जैसे देश में, जहाँ आस्था और धर्म की सीमाएँ हमेशा स्पष्ट रूप से रेखांकित नहीं रही हैं, वहाँ इस प्रकार का कदम व्यवहारिक दृष्टि से जटिल और विवादास्पद हो सकता है। पीर निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ हिंदुओं सहित विभिन्न धर्मों के लोग सदियों से श्रद्धा के साथ मत्था टेकते आए हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर का संदर्भ ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर में केवल हिंदुओं को गर्भगृह में प्रवेश दिया जाता है। गैर-हिंदू बाहर बने दर्शन मंच से दर्शन करते हैं। समर्थक इसे परंपरा मानते हैं, जबकि आलोचक इसे आधुनिक संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर देखते हैं। धार्मिक सहिष्णुता का महत्व धार्मिक सहिष्णुता भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को बढ़ावा देती है, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी बनाए रखती है। जब हम किसी धार्मिक स्थल के प्रवेश पर रोक लगाते हैं, तो हम इस सहिष्णुता को खतरे में डालते हैं। क्या यह उचित है कि हम अपने धार्मिक स्थलों को केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित कर दें? स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव चारधाम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। तीर्थ पर्यटन से जुड़े व्यवसाय, जैसे होटल, रेस्टोरेंट और स्थानीय हस्तशिल्प, इन नियमों से प्रभावित हो सकते हैं। क्या हम अपने धार्मिक स्थलों को आर्थिक विकास के अवसरों से वंचित करना चाहते हैं? निष्कर्ष मंदिर प्रवेश विवाद केवल कौन अंदर जाएगा का सवाल नहीं है। यह आस्था, संविधान, सामाजिक सौहार्द और भारत की सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन खोजने की बहस है। हमें यह समझना होगा कि धार्मिक स्थलों का उद्देश्य केवल पूजा करना नहीं है, बल्कि वे सभी के लिए एक साझा अनुभव भी हैं। इसलिए, हमें इस मुद्दे पर विचार करते समय सभी पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए। क्या हम एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं, जहाँ सभी धर्मों का सम्मान हो? क्या हम एक ऐसा भारत चाहते हैं, जहाँ धार्मिक सहिष्णुता और विविधता का जश्न मनाया जाए? इस संदर्भ में, हमें यह भी याद रखना चाहिए कि धार्मिक स्थलों की पहचान केवल उनके भौतिक स्वरूप से नहीं होती, बल्कि वे हमारे साझा अनुभवों और सांस्कृतिक धरोहरों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े पर सुप्रीम कोर्ट का सख़्त रुख

    उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर हो रहे वन भूमि कब्ज़े (लैंड ग्रैबिंग) के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बेहद सख़्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार और प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अधिकारी “मूक दर्शक” बने रहे, जबकि उनकी आँखों के सामने वन भूमि पर अवैध कब्ज़ा किया जा रहा था। प्रशासन की विफलता पर सवाल अदालत ने वन संरक्षण को राज्य का संवैधानिक दायित्व बताते हुए प्रशासन की विफलता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संविधान से मिले कर्तव्यों से मुँह मोड़ने जैसा है। राज्य सरकार का कहना है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी है, हालांकि अदालत ने इसे अपर्याप्त माना। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि पर्यावरण संरक्षण और कानून के पालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस फैसले को हिमालयी राज्य में भूमि प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सरकारी जवाबदेही के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। पृष्ठभूमि: ऋषिकेश और आसपास के इलाकों में बड़ा अतिक्रमण यह मामला मुख्य रूप से उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर ऋषिकेश और उसके आसपास के इलाकों में हज़ारों एकड़ वन भूमि पर हुए अवैध कब्ज़े से जुड़ा है। ये ज़मीनें पहले वन विभाग के अधीन थीं, लेकिन समय के साथ उन पर निजी व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब राज्य प्रशासन की जानकारी में होते हुए भी लंबे समय तक चलता रहा। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले भी राज्य में वन भूमि पर कब्ज़े की समस्या लगातार बनी हुई थी, लेकिन प्रभावी और स्थायी समाधान नहीं हो सका। वन अतिक्रमण की स्थिति (2020–2025) सरकारी रिकॉर्ड और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दायर हलफनामों से यह साफ होता है कि उत्तराखंड में वन भूमि पर अतिक्रमण एक दीर्घकालिक समस्या रही है। वर्ष 2023–24 के दौरान कई वन प्रभागों में छोटे-छोटे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयाँ की गईं, लेकिन वे समस्या के पैमाने के मुकाबले अपर्याप्त रहीं। वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में लगभग 2,400 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्ज़ा दर्ज किया गया है। इसी क्रम में, वर्ष 2025 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी वन प्रभाग में 7,000 से अधिक वन सीमा स्तंभों के रहस्यमय ढंग से गायब होने पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए राज्य और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। क्यों ऐतिहासिक है सुप्रीम कोर्ट का फैसला उत्तराखंड में भूमि कब्ज़े की समस्या कोई नई नहीं है। पिछले पाँच वर्षों के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि समय-समय पर कार्रवाई के बावजूद अवैध अतिक्रमण पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया। सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इसने केवल अतिक्रमण रोकने की बात नहीं की, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता को सीधे-सीधे संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन करार दिया है। यह निर्णय न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश के अन्य पर्यावरण-संवेदनशील राज्यों के लिए भी एक सख़्त नज़ीर के रूप में देखा जा रहा है। वन भूमि संरक्षण की आवश्यकता वन भूमि का संरक्षण केवल एक कानूनी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। वन क्षेत्र न केवल जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करते हैं। जब हम वन भूमि की रक्षा करते हैं, तो हम अपने भविष्य की रक्षा कर रहे होते हैं। क्या हमें अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए और अधिक सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता नहीं है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसका उत्तर हमें खुद देना होगा। स्थानीय समुदाय की भूमिका स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। वे अपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक होते हैं और उनकी पारंपरिक ज्ञान से वन भूमि की रक्षा में मदद मिल सकती है। सरकार को चाहिए कि वह स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण के प्रयासों में शामिल करे। इससे न केवल वन भूमि की रक्षा होगी, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार होगा। निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े के मामलों में एक नया अध्याय खोलता है। यह न केवल प्रशासनिक जवाबदेही को बढ़ावा देता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम अपने वन क्षेत्रों की रक्षा करें। यह न केवल हमारे लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है। क्या हम इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए तैयार हैं? इस प्रकार, उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े की समस्या को सुलझाने के लिए हमें एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण की रक्षा करें और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।

  • उत्तराखंड से पलायन रोकने के दावे हर साल क्यों खोखले साबित हो रहे हैं?

    Photo source- AI generated हर चुनाव से पहले एक वादा ज़रूर दोहराया जाता है- “अब उत्तराखंड से पलायन रुकेगा।” नई योजनाएं आती हैं, आयोग बनते हैं, रिपोर्टें जारी होती हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि हर साल गांव और खाली होते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि पलायन हो रहा है या नहीं। सवाल यह है कि इसे रोकने के दावे हर बार असफल क्यों हो जाते हैं? सरकारों का कहना है कि रोजगार बढ़ रहा है और स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है। कागजों में सब कुछ ठीक दिखता है। लेकिन अगर आप किसी पहाड़ी गांव में जाएं, तो बंद घर, खाली स्कूल और केवल बुजुर्ग नज़र आते हैं। युवा वहां नहीं हैं। पलायन को अक्सर सिर्फ नौकरी की कमी से जोड़ा जाता है, जबकि असली समस्या कहीं गहरी है। कुछ नौकरियां हैं, लेकिन वे अस्थायी हैं और भविष्य की सुरक्षा नहीं देतीं। स्वरोजगार योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी और मार्गदर्शन गांव तक नहीं पहुंचता। शिक्षा व्यवस्था भी बराबरी का मौका नहीं दे पाती, जिससे बाहर जाना मजबूरी बन जाता है। हम कहते हैं-“पढ़-लिखकर वापस आओ”, लेकिन लौटने पर न अवसर मिलता है, न सिस्टम का सहयोग। ऐसे में युवा टिके भी तो कैसे? पलायन सिर्फ लोगों का नहीं, भरोसे का भी होता है। जब भरोसा टूटता है, तो गांव धीरे-धीरे खाली हो जाते हैं। अगर योजनाएं और आयोग मौजूद हैं, तो फिर हर साल यह सच्चाई क्यों दोहराई जा रही है? शायद समस्या योजनाओं की नहीं, उन्हें समझने और लागू करने के तरीके की है। आपके गांव की क्या कहानी है? अपना अनुभव साझा कीजिए—क्योंकि उत्तराखंड की असली तस्वीर कागजों में नहीं, लोगों की ज़िंदगी में दिखती है। Source- srscrr261016-3.pdf 3.3 lakh people migrated from Uttarakhand from 2018 to 2022, says report | Dehradun News - Times of India

  • Winter Forest Fire में उत्तराखंड शीर्ष पर, दो महीनों में 1900 से अधिक अलर्ट: Forest Survey of India की रिपोर्ट

    Image source- Self उत्तराखंड ने इस सर्दी के मौसम (नवंबर से अब तक) में लगभग 1,900 वनाग्नि (forest fire) अलर्ट प्राप्त किए हैं, जो पूरे देश में सबसे अधिक संख्या है। इसमें मध्‍य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड का आंकड़ा शीर्ष पर है।सामान्यतः बर्फ और ठंड से सुरक्षित रहने वाले जंगलों में इस समय आग लगना जलवायु परिवर्तन, घटती नमी और बिगड़ते वन प्रबंधन की ओर इशारा करता है । उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने TOI को बताया कि 20% अलर्ट Reserved Forest में हो सकते हैं और 40% अलर्ट कम गंभीर प्रकृति के हैं। उन्होंने वन अग्नि प्रबंधन समितियों (Forest Fire Management Committees) के ज़रिए ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों की सहभागिता बढ़ाने का ज़िक्र भी किया।(Times of India, 25th Dec) यह कोई स्थानीय या सीमित घटना नहीं है, बल्कि तेज़ी से एक वैश्विक वास्तविकता बनती जा रही है। नासा के टेरा (Terra) और एक्वा (Aqua) उपग्रह प्रतिदिन दो बार सक्रिय वनाग्नि सूचना दे रहे  हैं। वैज्ञानिकों ने इन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का 21 वर्षों तक अध्ययन किया, जिसमें यह सामने आया कि अत्यधिक तीव्र (Extreme) वनाग्नि की घटनाएँ न केवल बढ़ी हैं, बल्कि वे अब पहले की तुलना में अधिक बार, अधिक तीव्रता के साथ और बड़े क्षेत्र में फैल रही हैं।वनाग्नि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का एक प्रमुख स्रोत भी बनती जा रही हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, 2001 से 2023 के बीच विश्व स्तर पर जंगलों में लगी आग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।( Wildfires and Climate Change - NASA Science ) ऐसे समय में, जब अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियाँ पेरिस जलवायु समझौते को लेकर असमंजस और आशंकाओं में दिखाई देती हैं, भारत के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक समर्पित और रणनीतिक रोडमैप तैयार करे। यह रोडमैप केवल उत्सर्जन कटौती तक सीमित न होकर, वायु गुणवत्ता सुधार, आपदा-प्रबंधन, वन संरक्षण और जल संसाधनों की सुरक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखे। इस पूरे परिदृश्य में उत्तराखंड की भूमिका निर्णायक बन जाती है। हिमालय केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल, जलवायु और जैव विविधता की रीढ़ है। यदि उत्तराखंड में पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है, तो उसका प्रभाव पूरे गंगा मैदानी क्षेत्र और उससे आगे तक पड़ेगा। आज यह तेजी से स्पष्ट हो रहा है कि यह केवल विकास बनाम पर्यावरण की बहस नहीं, बल्कि राज्य के अस्तित्व और भविष्य की लड़ाई है। अब आवश्यकता है कि उत्तराखंड को केवल एक आपदा-प्रभावित राज्य के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु समाधान के केंद्र (climate action hub) के रूप में देखा जाए , जहाँ नीति, विज्ञान, स्थानीय समुदाय और सतत विकास एक साथ मिलकर काम करें।

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