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उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े पर सुप्रीम कोर्ट का सख़्त रुख

  • Admin
  • Jan 20
  • 3 min read

Updated: 7 days ago

उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर हो रहे वन भूमि कब्ज़े (लैंड ग्रैबिंग) के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बेहद सख़्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार और प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि अधिकारी “मूक दर्शक” बने रहे, जबकि उनकी आँखों के सामने वन भूमि पर अवैध कब्ज़ा किया जा रहा था।


प्रशासन की विफलता पर सवाल


अदालत ने वन संरक्षण को राज्य का संवैधानिक दायित्व बताते हुए प्रशासन की विफलता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संविधान से मिले कर्तव्यों से मुँह मोड़ने जैसा है। राज्य सरकार का कहना है कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी है, हालांकि अदालत ने इसे अपर्याप्त माना। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि पर्यावरण संरक्षण और कानून के पालन में किसी भी प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।


इस फैसले को हिमालयी राज्य में भूमि प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सरकारी जवाबदेही के लिहाज़ से एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।


पृष्ठभूमि: ऋषिकेश और आसपास के इलाकों में बड़ा अतिक्रमण


यह मामला मुख्य रूप से उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों, विशेषकर ऋषिकेश और उसके आसपास के इलाकों में हज़ारों एकड़ वन भूमि पर हुए अवैध कब्ज़े से जुड़ा है। ये ज़मीनें पहले वन विभाग के अधीन थीं, लेकिन समय के साथ उन पर निजी व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा कब्ज़ा कर लिया गया।


चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब राज्य प्रशासन की जानकारी में होते हुए भी लंबे समय तक चलता रहा। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले भी राज्य में वन भूमि पर कब्ज़े की समस्या लगातार बनी हुई थी, लेकिन प्रभावी और स्थायी समाधान नहीं हो सका।


वन अतिक्रमण की स्थिति (2020–2025)


सरकारी रिकॉर्ड और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में दायर हलफनामों से यह साफ होता है कि उत्तराखंड में वन भूमि पर अतिक्रमण एक दीर्घकालिक समस्या रही है। वर्ष 2023–24 के दौरान कई वन प्रभागों में छोटे-छोटे अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयाँ की गईं, लेकिन वे समस्या के पैमाने के मुकाबले अपर्याप्त रहीं।


वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में लगभग 2,400 हेक्टेयर वन भूमि पर अवैध कब्ज़ा दर्ज किया गया है। इसी क्रम में, वर्ष 2025 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी वन प्रभाग में 7,000 से अधिक वन सीमा स्तंभों के रहस्यमय ढंग से गायब होने पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर मामला बताते हुए राज्य और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया।


क्यों ऐतिहासिक है सुप्रीम कोर्ट का फैसला


उत्तराखंड में भूमि कब्ज़े की समस्या कोई नई नहीं है। पिछले पाँच वर्षों के घटनाक्रम यह दर्शाते हैं कि समय-समय पर कार्रवाई के बावजूद अवैध अतिक्रमण पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया। सुप्रीम कोर्ट का यह हालिया फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि इसने केवल अतिक्रमण रोकने की बात नहीं की, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता को सीधे-सीधे संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन करार दिया है।


यह निर्णय न केवल उत्तराखंड, बल्कि देश के अन्य पर्यावरण-संवेदनशील राज्यों के लिए भी एक सख़्त नज़ीर के रूप में देखा जा रहा है।


वन भूमि संरक्षण की आवश्यकता


वन भूमि का संरक्षण केवल एक कानूनी आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। वन क्षेत्र न केवल जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करते हैं।


जब हम वन भूमि की रक्षा करते हैं, तो हम अपने भविष्य की रक्षा कर रहे होते हैं। क्या हमें अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए और अधिक सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता नहीं है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसका उत्तर हमें खुद देना होगा।


स्थानीय समुदाय की भूमिका


स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। वे अपने आस-पास के पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक होते हैं और उनकी पारंपरिक ज्ञान से वन भूमि की रक्षा में मदद मिल सकती है।


सरकार को चाहिए कि वह स्थानीय समुदायों को वन संरक्षण के प्रयासों में शामिल करे। इससे न केवल वन भूमि की रक्षा होगी, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार होगा।


निष्कर्ष


सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े के मामलों में एक नया अध्याय खोलता है। यह न केवल प्रशासनिक जवाबदेही को बढ़ावा देता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।


हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम अपने वन क्षेत्रों की रक्षा करें। यह न केवल हमारे लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है। क्या हम इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए तैयार हैं?


इस प्रकार, उत्तराखंड में वन भूमि कब्ज़े की समस्या को सुलझाने के लिए हमें एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण की रक्षा करें और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखें।

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