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अगर चारधाम यात्रा ‘हिंदू-only’ हो गई, तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सिर्फ़ श्लोक बनकर रह जाएगा

  • Admin
  • Feb 8
  • 2 min read

Updated: Mar 25

Source- AI generated
Source- AI generated

चारधाम यात्रा पर गैर-हिंदुओं की एंट्री को लेकर उठ रहा विवाद अब केवल एक प्रशासनिक या धार्मिक फैसला नहीं रह गया है। यह बहस सीधे-सीधे भारत की सांस्कृतिक आत्मा और हिंदू धर्म की वैश्विक छवि पर सवाल खड़े करती है।


पिछले लेख में हम इसके संभावित फायदे और नुकसान पर चर्चा कर चुके हैं। लेकिन इस बहस का एक और पहलू है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता - धर्म की वैश्विक स्वीकार्यता का मुद्दा।


बीते कुछ दशकों में हिंदू दर्शन ने दुनिया को आकर्षित किया है। योग, वेदांत, गीता और उपनिषदों का संदेश आज वैश्विक चेतना का हिस्सा बन चुका है। स्टीव जॉब्स का नीम करौली बाबा के कैंची धाम तक पहुँचना, पश्चिमी देशों में ‘हरे कृष्ण-हरे राम’ का गूंजना, या हॉलीवुड की चर्चित हस्तियों का हिंदू धर्म अपनाना - ये सब उसी सॉफ्ट पावर के उदाहरण हैं। पिछले वर्ष वॉशिंगटन में दिवाली पर सार्वजनिक अवकाश घोषित होना भी इसी सांस्कृतिक प्रभाव का संकेत है।


ये घटनाएँ न सिर्फ़ हिंदू संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित कर रही हैं, बल्कि गैर-हिंदुओं में जिज्ञासा और सम्मान भी पैदा कर रही हैं।


यह फैसला उस बढ़ते आकर्षण को ठेस पहुँचाएगा, जिस पर हिंदू धर्म की वैश्विक स्वीकार्यता टिकी है। साथ ही, भारत की धार्मिक सहिष्णुता की छवि को भी नुकसान पहुँचेगा। आशंका यह भी है कि इसकी नकल करते हुए अन्य धर्म अपने-अपने तीर्थस्थलों को सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।


धर्म की रक्षा दरवाज़े बंद करके नहीं,

अपने मूल्यों को आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखकर होती है।


Reference-

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अर्थ :

यह मेरा है और वह पराया है - ऐसा विचार छोटे मन वालों का होता है।

उदार हृदय वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार होती है।

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