
Editorial desk
19 Mar 2023
बीते कुछ दशकों में हिंदू दर्शन ने दुनिया को आकर्षित किया है। योग, वेदांत, गीता और उपनिषदों का संदेश आज वैश्विक चेतना का हिस्सा बन चुका है।
मां के नाम पेड़ लगाइए, हाईवे के नाम कटवाइए: धामी सरकार के हरेला और विकास की दो फाइलें!
हरेला पर्व पर जागेश्वर धाम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का "एक पेड़ मां के नाम" का आह्वान सुना, तो मन भर आया। लगा कि उत्तराखंड को आखिर ऐसा मुखिया मिल गया है, जो पेड़ों को लकड़ी नहीं, परिवार क ा सदस्य मानता है।
फिर भानियावाला–ऋषिकेश मार्ग याद आ गया। वहां हज़ारों पेड़ सड़क चौड़ीकरण की सूची में दर्ज हैं। दुविधा यह थी कि दोनों बातें एक साथ सच कैसे हो सकती हैं?
कुछ दिन बाद खबर आई कि मुख्यमंत्री ने कटान पर रोक लगा दी है। कहा गया कि जब तक सबकी सहमति नहीं बनती, पेड़ नहीं कटेंगे। राहत मिली। फिर ध्यान गया कि रोक "स्थगित" शब्द के सहारे खड़ी है। "रद्द" शब्द कहीं नहीं है। यानी पेड़ फिलहाल बचे नहीं हैं, बस वेटिंग रूम में बैठे हैं। उनकी फाइल पर "अगली तारीख" लिखा है।
शायद गलती हमा री ही है। हमने मान लिया था कि हरेला का भाषण और सड़क की फाइल एक ही मेज़ पर रखी होंगी। असल में दोनों अलग-अलग इमारतों में रहती हैं। एक में पेड़ ऑक्सीजन से गिने जाते हैं, दूसरी में घनमीटर से। एक फाइल में जो "पेड़" है, दूसरी तक पहुंचते-पहुंचते वह "अवरोध" बन जाता है।
इस बीच बागेश्वर और पिथौरागढ़ के कई गांव आज भी एक मोटर सड़क का इंतज़ार कर रहे हैं। पर वहां सड़क बनाना शायद उतना "दिखने वाला" विकास नहीं है, जितना पहले से बनी सड़क को और चौड़ा करना। विकास का पैमाना भी दिलचस्प है: सड़क जितनी चौड़ी, जंगल उतना पतला।
कभी-कभी तो लगता है कि योजनाएं बनाने वाली मेज़ पर अब नक्शे नहीं, बुलडोज़रों के कै टलॉग रखे रहते हैं। मंच से हरियाली के भाषण होते हैं और पीछे फाइलें अपना काम करती रहती हैं।
आखिर पेड़ लगाइए भी, काटिए भी। तभी तो विकास और पर्यावरण, दोनों के आंकड़े संतुलित रहेंगे।
