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Winter Forest Fire में उत्तराखंड शीर्ष पर, दो महीनों में 1900 से अधिक अलर्ट: Forest Survey of India की रिपोर्ट

Editorial desk

18 Mar 2023

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उत्तराखंड ने इस सर्दी के मौसम (नवंबर से अब तक) में लगभग 1,900 वनाग्नि (forest fire) अलर्ट प्राप्त किए हैं, जो पूरे देश में सबसे अधिक संख्या है। इसमें मध्‍य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड का आंकड़ा शीर्ष पर है।सामान्यतः बर्फ और ठंड से सुरक्षित रहने वाले जंगलों में इस समय आग लगना जलवायु परिवर्तन, घटती नमी और बिगड़ते वन प्रबंधन की ओर इशारा करता है ।

उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने TOI को बताया कि 20% अलर्ट Reserved Forest में हो सकते हैं और 40% अलर्ट कम गंभीर प्रकृति के हैं। उन्होंने वन अग्नि प्रबंधन समितियों (Forest Fire Management Committees) के ज़रिए ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों की सहभागिता बढ़ाने का ज़िक्र भी किया।(Times of India, 25th Dec)

यह कोई स्थानीय या सीमित घटना नहीं है, बल्कि तेज़ी से एक वैश्विक वास्तविकता बनती जा रही है। नासा के टेरा (Terra) और एक्वा (Aqua) उपग्रह प्रतिदिन दो बार सक्रिय वनाग्नि सूचना दे रहे हैं। वैज्ञानिकों ने इन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का 21 वर्षों तक अध्ययन किया, जिसमें यह सामने आया कि अत्यधिक तीव्र (Extreme) वनाग्नि की घटनाएँ न केवल बढ़ी हैं, बल्कि वे अब पहले की तुलना में अधिक बार, अधिक तीव्रता के साथ और बड़े क्षेत्र में फैल रही हैं।वनाग्नि कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का एक प्रमुख स्रोत भी बनती जा रही हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, 2001 से 2023 के बीच विश्व स्तर पर जंगलों में लगी आग से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में लगभग 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।(Wildfires and Climate Change - NASA Science)

ऐसे समय में, जब अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियाँ पेरिस जलवायु समझौते को लेकर असमंजस और आशंकाओं में दिखाई देती हैं, भारत के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक समर्पित और रणनीतिक रोडमैप तैयार करे। यह रोडमैप केवल उत्सर्जन कटौती तक सीमित न होकर, वायु गुणवत्ता सुधार, आपदा-प्रबंधन, वन संरक्षण और जल संसाधनों की सुरक्षा जैसे मुद्दों को केंद्र में रखे।

इस पूरे परिदृश्य में उत्तराखंड की भूमिका निर्णायक बन जाती है। हिमालय केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जल, जलवायु और जैव विविधता की रीढ़ है। यदि उत्तराखंड में पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है, तो उसका प्रभाव पूरे गंगा मैदानी क्षेत्र और उससे आगे तक पड़ेगा। आज यह तेजी से स्पष्ट हो रहा है कि यह केवल विकास बनाम पर्यावरण की बहस नहीं, बल्कि राज्य के अस्तित्व और भविष्य की लड़ाई है।

अब आवश्यकता है कि उत्तराखंड को केवल एक आपदा-प्रभावित राज्य के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु समाधान के केंद्र (climate action hub) के रूप में देखा जाए , जहाँ नीति, विज्ञान, स्थानीय समुदाय और सतत विकास एक साथ मिलकर काम करें।


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